india

दिल्ली विधानसभा चुनाव में हार के बाद मोदी सरकार ने 614 मदरसों को बंद करने का किया ऐलान

दिल्ली विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद बीजेपी ने मुस्लिम वर्ग को तंगड़ा झटका दिया है। मोदी सरकार ने  614 मदरसों को बंद करने का ऐलान किया है। इन मदरसों को अगले एक से दो महीनों के अंदर बंद कर दिया जाएगा। यह काम असम में किया जा रहा है जहां की सरकार ने यह ऐलान कर दिया है। साथ ही बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार ने इन संस्थानों को उच्च और उच्चतर माध्यमिक स्कूलों में बदला जाएगा।

असम के वित्त मंत्री हेमंत बिस्वा सरमा का कहना है कि राज्य सरकार ने आम लोगों के पैसे को धार्मिक शिक्षा पर खर्च नहीं करने का फैसला लिया है। मदरसों के साथ ही सरकार 101 संस्कृत संस्थान भी बंद करने जा रही है। हेमंत बिस्वा सरमा ने आगे कहा कि अरबी और धार्मिक पाठ पढ़ाना सरकार का काम नहीं है। एक धर्मनिरपेक्ष देश में धार्मिक शिक्षा को सरकार द्वारा वित्तपोषित नहीं किया जा सकता है। अगर सरकार द्वारा संचालित मदरसों में धार्मिक बातें पढ़ाने की अनुमति दी जाती है तो फिर गीता या बाइबिल को भी सरकारी फंड से पढ़ाया जाना चाहिए।

आपको बता दें कि सरकार हर साल मदरसों में 3 से 4 करोड़ और संस्कृत संस्थानों में एक करोड़ रुपये खर्च करती है। हेमंत बिस्वा सरमा ने कहा, ‘इन मदरसों में कार्यरत अध्यापक कहीं और रोजगार की चिंता किए बिना घर पर रह सकते हैं। सरकार उनके रिटायरमेंट तक सैलरी देती रहेगी।’ इसी तरह संस्कृत संस्थानों की फंडिंग रोकने पर हेमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि लोग यह न कहें कि धार्मिक आधार पर मदरसे को निशाना बनाया जा रहा है। निजी संस्थानों द्वारा संचालित मदरसे और संस्कृत पहले की तरह काम जारी रख सकते हैं। असम में प्राइवेट मरदसे की संख्या 900 है जिन्हें जमियत उलेमा द्वारा संचालित किया जाता है।

तत्कालीन राज्य मदरसा शिक्षा बोर्ड की वेबसाइट में मदरसे को अरबी शब्द के रूप में परिभाषित किया है जो धर्म, जाति, पंथ और लिंग के बावजूद सभी को शिक्षा प्रदान करने वाला शैक्षिक संस्थान है। जमीयत उलेमा के लीगल सेल के संयोजक मसूद अख्तर जमान ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा वित्तपोषित मदरसों के बंद होने से प्राइवेट मदरसा एजुकेशन सिस्टम में कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। वहीं, मसूद अख्तर ने कहा, ‘हमारे मदरसे सरकार से एक भी पैसे को मोहताज नहीं है। हमारे सभी छात्र बीपीएल परिवारों से हैं और हम उनकी रहने, खाने और कपड़ों का ध्यान रखते हैं।’

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *